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भगवद्गीता

महाभारत (भीष्म पर्व) का अमर उपदेश — 18 अध्याय, 700 श्लोक

पढ़ने का समय

12 मिनट

श्लोक

700

अध्याय

18

स्रोत

महाभारत

एक मिनट में समझें

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन के बारे में महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं। यह 18 अध्यायों में बँटा है और 700 श्लोकों से बना है। इसमें कर्म, धर्म, भक्ति और ज्ञान के बारे में गहरी बातें हैं जो आज भी हमारे जीवन के लिए प्रासंगिक हैं।

मुख्य संदेश:

  • अपना कर्तव्य करो, फल की चिंता मत करो
  • भक्ति और ज्ञान दोनों महत्वपूर्ण हैं
  • आत्मा अविनाशी है

सभी 18 अध्याय — नाम व भावार्थ

अध्याय 1अर्जुन विषाद योग

रणभूमि में अर्जुन का मोह व विषाद; कर्तव्य पर संशय।

अध्याय 2सांख्य योग

आत्मा की अमरता और निष्काम कर्म का मूल उपदेश।

अध्याय 3कर्म योग

फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-पालन का मार्ग।

अध्याय 4ज्ञान-कर्म-संन्यास योग

ज्ञान सहित कर्म, और अवतार का रहस्य।

अध्याय 5कर्म-संन्यास योग

कर्म और संन्यास का समन्वय, समत्व-भाव।

अध्याय 6ध्यान (आत्मसंयम) योग

मन के संयम और ध्यान-साधना का मार्ग।

अध्याय 7ज्ञान-विज्ञान योग

ईश्वर की प्रकृति और भक्तों के प्रकार।

अध्याय 8अक्षर-ब्रह्म योग

अंतकाल का स्मरण और अविनाशी ब्रह्म।

अध्याय 9राजविद्या-राजगुह्य योग

सर्वश्रेष्ठ गोपनीय ज्ञान और शरणागति।

अध्याय 10विभूति योग

भगवान की दिव्य विभूतियों का वर्णन।

अध्याय 11विश्वरूप-दर्शन योग

अर्जुन को भगवान के विराट विश्वरूप के दर्शन।

अध्याय 12भक्ति योग

भक्ति को सुगम व सर्वश्रेष्ठ मार्ग बताया गया।

अध्याय 13क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग

शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) का विवेक।

अध्याय 14गुणत्रय-विभाग योग

सत्त्व, रज, तम — तीन गुणों का विश्लेषण।

अध्याय 15पुरुषोत्तम योग

संसार-वृक्ष और परम पुरुषोत्तम का स्वरूप।

अध्याय 16दैवासुर-संपद्-विभाग योग

दैवी और आसुरी स्वभाव का भेद।

अध्याय 17श्रद्धात्रय-विभाग योग

श्रद्धा, आहार, यज्ञ-दान के तीन प्रकार।

अध्याय 18मोक्ष-संन्यास योग

त्याग, शरणागति और समस्त उपदेश का सार।

ग्रंथ आधारितविद्वान द्वारा सत्यापितअनुवाद सत्यापित

📖 परिचय — भगवद्गीता

भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व में स्थित सात सौ श्लोकों का वह संवाद है जो कुरुक्षेत्र के रणभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया, जब अर्जुन अपने ही स्वजनों से युद्ध करने के प्रश्न पर मोहग्रस्त हो गए थे। यह अठारह अध्यायों में विभाजित है और यद्यपि यह महाभारत के भीतर स्थित है, इसे प्रायः स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में भी पढ़ा-पढ़ाया जाता है। गीता की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह मुक्ति के तीन प्रमुख मार्गों — कर्मयोग (निष्काम कर्म का मार्ग), भक्तियोग (समर्पण और प्रेम का मार्ग) और ज्ञानयोग (आत्म-विवेक का मार्ग) — को परस्पर विरोधी न मानकर, व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार तीनों को समान आदर से प्रस्तुत करती है। आरंभिक अध्यायों में अर्जुन के विषाद और सांख्य-ज्ञान की चर्चा है, मध्य अध्यायों में कर्मयोग, ध्यान और भक्ति का विस्तृत विवेचन है, तथा अंतिम अध्यायों में गुण-विभाग और शरणागति की शिक्षा के साथ गीता का समापन होता है। आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य सहित लगभग सभी प्रमुख वेदान्त-आचार्यों ने गीता पर भाष्य लिखा है, जो इसे प्रस्थानत्रयी के तीन आधार-ग्रंथों में से एक बनाता है — शेष दो हैं उपनिषद और ब्रह्मसूत्र।

🔑 18 अध्याय की झलक और तीन योग-मार्ग

  • अध्याय 1-2: अर्जुन का विषाद और सांख्य-ज्ञान — गीता की दार्शनिक नींव।
  • अध्याय 3-6: कर्मयोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग — कर्म व साधना का मार्ग।
  • अध्याय 7-12: ईश्वर-स्वरूप, विभूति, विश्वरूप-दर्शन और भक्तियोग।
  • अध्याय 13-18: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेक, त्रिगुण-विभाग और अंतिम शरणागति की शिक्षा।
  • कर्मयोग: फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य-पालन करने का मार्ग।
  • भक्तियोग: श्रद्धा और समर्पण के द्वारा ईश्वर से जुड़ने का मार्ग।
  • ज्ञानयोग: आत्मा और अनात्मा के विवेक द्वारा सत्य को पहचानने का मार्ग।

📖 भगवद्गीता का अध्याय-वार विस्तृत अध्ययन-पृष्ठ देखें — प्रमुख श्लोक और व्यावहारिक प्रयोग सहित।

विस्तार से पढ़ें →

प्रश्नोत्तर

गीता के 18 अध्यायों को किन तीन मुख्य भागों में समझा जाता है?

परंपरा में इन्हें प्रायः छह-छह अध्यायों के तीन खंडों में देखा जाता है — कर्मयोग-प्रधान (1-6), भक्तियोग-प्रधान (7-12) और ज्ञानयोग-प्रधान (13-18) — यद्यपि तीनों विषय पूरे ग्रंथ में परस्पर गुँथे हुए हैं।

क्या कर्म, भक्ति और ज्ञान योग में से कोई एक "श्रेष्ठ" मार्ग है?

गीता स्वयं किसी एक मार्ग को दूसरे से श्रेष्ठ घोषित नहीं करती; यह व्यक्ति की प्रकृति और रुचि के अनुसार तीनों मार्गों को समान आदर से प्रस्तुत करती है।

गीता महाभारत से स्वतंत्र ग्रंथ है क्या?

नहीं, यह महाभारत के भीष्म पर्व का ही अंश है, यद्यपि इसकी लोकप्रियता के कारण इसे प्रायः स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में भी पढ़ा जाता है।

प्रस्थानत्रयी में गीता का क्या स्थान है?

उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता — इन तीनों को साथ मिलाकर प्रस्थानत्रयी कहा जाता है, जो हर वेदान्त-आचार्य के भाष्य का आधार रहा है।

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