भारतीय मानस में यदि कोई एक कथा शताब्दियों से घर-घर की साँझ का दीपक रही है, तो वह श्रीराम की कथा है। आदिकवि वाल्मीकि की रामायण से लेकर गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस तक, तमिल की कम्ब रामायण से बांग्ला की कृत्तिवासी रामायण तक — यह कथा हर युग और हर भाषा में नए स्वर से गाई गई, किंतु उसका हृदय एक ही रहा: मर्यादा। श्रीराम को परंपरा "मर्यादा पुरुषोत्तम" कहती है — वह पुरुषोत्तम, जिसने अपने हर संबंध की मर्यादा निभाई: पुत्र के रूप में वचन, भाई के रूप में स्नेह, पति के रूप में एकनिष्ठा, मित्र के रूप में विश्वास, राजा के रूप में प्रजा-हित और शत्रु के प्रति भी धर्म-नीति।
परंपरा के अनुसार रामकथा सात कांडों में बहती है — जन्म और शिक्षा का बालकांड; त्याग की पराकाष्ठा अयोध्याकांड; वन की परीक्षाओं का अरण्यकांड; मैत्री और नीति-मंथन का किष्किंधाकांड; आशा और सेवा का सुंदरकांड; धर्म-विजय का युद्धकांड; और रामराज्य तथा करुण प्रश्नों का उत्तरकांड। इस शृंखला में प्रत्येक कांड का एक स्वतंत्र, विस्तृत पृष्ठ है — मौलिक हिंदी में कही गई प्रवाहमयी कथा, मुख्य पात्र व घटनाएँ, शिक्षाएँ, प्रश्नोत्तर और स्रोत-सूचना के साथ।
इस प्रस्तुति की कुछ प्रतिज्ञाएँ हैं, जो हर पृष्ठ पर निभाई गई हैं। पहली — ईमानदारी: वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, अध्यात्म रामायण और क्षेत्रीय रामायणें एक ही कथा को भिन्न-भिन्न दृष्टि से कहती हैं; जहाँ कोई प्रसंग केवल एक परंपरा में है (जैसे लक्ष्मण-रेखा या पुष्पवाटिका-प्रसंग), वहाँ यह स्पष्ट लिखा गया है — संस्करणों को आपस में मिलाकर कोई नई खिचड़ी-कथा नहीं गढ़ी गई। दूसरी — संयम: कोई श्लोक-संख्या या सर्ग-संख्या गढ़ी नहीं गई; कठिन प्रसंग (बाली-वध, अग्नि-परीक्षा, सीता-निर्वासन) दोनों पक्षों और स्रोत-भेद सहित, संयत भाषा में कहे गए हैं। तीसरी — श्रद्धा के साथ विवेक: उत्तरकांड की पाठ-स्थिति पर विद्वानों का मत-भेद जैसी बातें छिपाई नहीं गईं, क्योंकि जानकारी श्रद्धा की विरोधी नहीं — उसकी सहेली है।
रामकथा को पढ़ना केवल एक प्राचीन वृत्तांत जानना नहीं है। यह देखना है कि वचन का मूल्य क्या होता है, अधिकार छोड़ने की सहजता कैसी होती है, सेवा किस ऊँचाई तक जा सकती है, और कठिन प्रश्नों से आँख मिलाने वाला धर्म कैसा दिखता है। सात कांड — सात द्वार हैं; किसी से भी प्रवेश कीजिए, पहुँचेंगे उसी मर्यादा के आँगन में।