52 शक्तिपीठ
प्रत्येक पीठ का मंदिर-परिचय और कथा — देवी (शक्ति) रूप, भैरव, गिरा अंग/आभूषण और आधुनिक स्थान सहित। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं में भिन्न मिलती हैं (51/52/108) — यह एक व्यापक-प्रचलित 52-सूची है।
🪔 शक्तिपीठ-कथा : सती और दक्ष-यज्ञ
परंपरागत / पौराणिक कथापरंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।
सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।
मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।
ईमानदार नोट: शक्तिपीठों की सूचियाँ विभिन्न ग्रंथ-परंपराओं (देवी भागवत, तंत्र चूड़ामणि, पीठनिर्णय आदि) में भिन्न मिलती हैं — 51, 52 और 108 तक की गणनाएँ प्रचलित हैं। यहाँ एक व्यापक-प्रचलित 52-सूची दी गई है; जहाँ आधुनिक स्थान की पहचान विवादित या अनिश्चित है, वहाँ स्पष्ट रूप से "मतभेद उपलब्ध" या "स्थान सत्यापन लंबित" अंकित है। सभी विवरण श्रद्धा-परंपरा के रूप में प्रस्तुत हैं।
52 / 52 पीठ दिख रहे हैं
हिंगलाज (हिंगुला)
✦ कोट्टरी (हिंगलाज माता)
📍 हिंगोल नदी तट, लासबेला, बलूचिस्तान
मान्यता है कि यहाँ सती का ब्रह्मरंध्र — सिर का ऊर्ध्व भाग — गिरा; देवी कोट्टरी (हिंगलाज माता) रूप में और भैरव भीमलोचन रूप में पूजित। बलूचिस्तान की गुफा-शिला में विराजी देवी का यह पीठ कठिनतम तीर्थों में गिना जाता है और सिंधी-चारण परंपराओं की कुलदेवी-स्थली है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
शर्कररे (करवीपुर)
✦ महिषमर्दिनी
📍 सिंध क्षेत्र (सक्खर की परंपरा) — पहचान अनिश्चित
परंपरा के अनुसार यहाँ सती का नेत्र (त्रिनेत्र) गिरा; देवी महिषमर्दिनी रूप में और भैरव क्रोधीश रूप में पूजित माने गए। सिंध की देवी-परंपरा से जुड़े इस पीठ की आधुनिक स्थान-पहचान पर मतभेद है — यह पीठ स्मृति और श्रद्धा की परंपरा का जीवंत उदाहरण है।
मतभेद उपलब्धदर्शन व कथा →
सुगंधा
✦ सुनंदा
📍 शिकारपुर (गौरनदी), बरिशाल क्षेत्र
मान्यता है कि सुगंधा नदी के तट पर सती की नासिका गिरी; देवी सुनंदा (उग्रतारा) रूप में और भैरव त्र्यंबक रूप में पूजित। बरिशाल (बांग्लादेश) के शिकारपुर गाँव का यह पीठ पूर्वी बंगाल की शाक्त और तारा-उपासना परंपरा का जीवंत केंद्र है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
महामाया (कश्मीर)
✦ महामाया
📍 अमरनाथ क्षेत्र, कश्मीर की परंपरा — मतभेद
परंपरा कहती है कि कश्मीर क्षेत्र में सती का कंठ गिरा; देवी महामाया रूप में, भैरव त्रिसंध्येश्वर रूप में पूजित। व्यापक मान्यता इसे अमरनाथ की हिम-गुफा से जोड़ती है, जबकि कुछ लोक-परंपराएँ त्रिकूट (वैष्णो देवी) की ओर संकेत करती हैं — पहचान में मतभेद अंकित है।
मतभेद उपलब्धदर्शन व कथा →
ज्वालामुखी (ज्वालाजी)
✦ सिद्धिदा (अंबिका)
📍 ज्वालामुखी, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश
मान्यता है कि यहाँ सती की जिह्वा गिरी; देवी सिद्धिदा (अंबिका) रूप में और भैरव उन्मत्त रूप में पूजित। कांगड़ा के इस पीठ में कोई मूर्ति नहीं — चट्टान से निकलती नौ प्राकृतिक ज्वालाएँ ही देवी-रूप में पूजित हैं; ज्योति-दर्शन की यह परंपरा अद्वितीय है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
त्रिपुरमालिनी (जालंधर)
✦ त्रिपुरमालिनी
📍 देवी तालाब मंदिर, जालंधर, पंजाब
परंपरागत मान्यता है कि जालंधर में सती का वाम स्तन गिरा; देवी त्रिपुरमालिनी रूप में और भैरव भीषण रूप में विराजे। देवी तालाब मंदिर और उसका प्राचीन सरोवर पंजाब की माता-भक्ति, चौकी-जगराता परंपरा और नवरात्र-आयोजनों का केंद्रीय स्थान है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
जयदुर्गा (वैद्यनाथ)
✦ जयदुर्गा
📍 देवघर, झारखंड
मान्यता है कि देवघर में सती का हृदय गिरा — इसीलिए यह "हार्दपीठ" कहलाता है। देवी जयदुर्गा रूप में और स्वयं बाबा वैद्यनाथ भैरव रूप में विराजे — ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ का दुर्लभ संगम, जहाँ श्रावणी काँवर मेला विश्वप्रसिद्ध है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
गुह्येश्वरी (नेपाल)
✦ महाशिरा (गुह्येश्वरी)
📍 बागमती तट, पशुपतिनाथ के समीप, काठमांडू
नेपाल की परंपरा में मान्यता है कि बागमती तट पर सती के जानु (घुटने) गिरे — कुछ परंपराएँ गुह्य-अंग कहती हैं। देवी गुह्येश्वरी रूप में, भैरव कपाली रूप में पूजित; गर्भगृह में मूर्ति नहीं, रजत-कलश से ढकी जल-द्रोणी ही देवी-रूप है। पशुपतिनाथ के साथ युगल-तीर्थ।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
दाक्षायणी (मानस)
✦ दाक्षायणी
📍 मानसरोवर तट, कैलास क्षेत्र
परंपरा कहती है कि कैलास की छाया में मानसरोवर के तट पर सती का दक्षिण हस्त गिरा; देवी दाक्षायणी (दक्ष-पुत्री) रूप में शिला-वेदी पर पूजित हैं और भैरव अमर रूप में। सबसे दुर्गम शक्तिपीठ — कैलास-मानसरोवर यात्रा स्वयं इसकी साधना है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
विरजा (उत्कल)
✦ विमला (विरजा)
📍 जाजपुर, वैतरणी तट, ओडिशा
मान्यता है कि उत्कल में सती की नाभि गिरी — इसीलिए जाजपुर "नाभिगया" तीर्थ कहलाता है। देवी विरजा (विमला) द्विभुजा महिषमर्दिनी रूप में पूजित हैं और भैरव-स्थान स्वयं जगन्नाथ को प्राप्त है — शाक्त और वैष्णव धाराओं का विरल संगम-पीठ।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
गंडकी चंडी
✦ गंडकी (चंडी)
📍 मुक्तिनाथ क्षेत्र, गंडकी उद्गम, मुस्तांग
परंपरा के अनुसार गंडकी नदी के उद्गम-क्षेत्र में सती का गंडस्थल गिरा; देवी गंडकी-चंडी रूप में, भैरव चक्रपाणि रूप में पूजित। मुक्तिनाथ धाम और शालिग्राम-शिलाओं की इस भूमि में शक्ति, विष्णु और शिव — तीनों धाराओं की उपासना का विलक्षण संगम है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
बहुला
✦ बहुला देवी
📍 केतुग्राम (कटवा अंचल), पूर्व बर्धमान, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि अजय नदी के अंचल के केतुग्राम में सती की वाम बाहु गिरी; देवी बहुला रूप में और भैरव भीरुक रूप में विराजे। बंगाल की ग्राम-देवी परंपरा का यह पीठ लोक-जीवन, कृषि-संस्कृति और शाक्त-वैष्णव सह-अस्तित्व का सुंदर उदाहरण है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
मंगल चंडिका (उज्जयिनी)
✦ मंगल चंडिका
📍 उजानि (कोग्राम), पश्चिम बंगाल / उज्जैन की परंपरा
परंपरा के अनुसार यहाँ सती की कोहनी (कूर्पर) गिरी; देवी मंगल चंडिका रूप में और भैरव कपिलांबर रूप में पूजित। "उज्जयिनी" नाम से पहचान दो परंपराओं में बँटी है — बंगाल का उजानि-कोग्राम (मंगलकाव्य की मंगलचंडी) और उज्जैन की हरसिद्धि देवी; दोनों मान्यताएँ अंकित हैं।
मतभेद उपलब्धदर्शन व कथा →
त्रिपुर सुंदरी (माताबाड़ी)
✦ त्रिपुरेश्वरी (त्रिपुर सुंदरी)
📍 माताबाड़ी, उदयपुर, त्रिपुरा
मान्यता है कि त्रिपुरा के उदयपुर में सती का दक्षिण पाद गिरा; देवी त्रिपुर सुंदरी रूप में, भैरव त्रिपुरेश रूप में विराजे। कूर्म (कछुए) आकार के टीले पर बना माताबाड़ी मंदिर "कूर्मपीठ" कहलाता है — पूर्वोत्तर का प्रमुख शक्तिपीठ, दीपावली मेले के लिए प्रसिद्ध।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
भवानी (चट्टल)
✦ भवानी
📍 चंद्रनाथ पर्वत, सीताकुंड, चट्टग्राम
परंपरा कहती है कि चट्टल (चट्टग्राम) क्षेत्र में सती की दक्षिण बाहु गिरी; देवी भवानी रूप में और भैरव चंद्रशेखर रूप में पूजित। सीताकुंड के चंद्रनाथ पर्वत की सीढ़ियों वाली यह तीर्थ-यात्रा और शिवचतुर्दशी मेला बांग्लादेश का सबसे बड़ा हिंदू तीर्थ-आयोजन है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
भ्रामरी (त्रिस्रोता)
✦ भ्रामरी
📍 शालबाड़ी क्षेत्र, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि तीस्ता (प्राचीन त्रिस्रोता) नदी के अंचल में सती का वाम पाद गिरा; देवी भ्रामरी रूप में पूजित — वह देवी जिन्होंने भ्रमर-रूप धारण कर अरुण दैत्य का अंत किया। उत्तर बंगाल के शाल-वनों के बीच बसा यह पीठ प्रकृति-शक्ति की उपासना का केंद्र है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
कामाख्या (कामगिरि)
✦ कामाख्या
📍 नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी, असम
शक्तिपीठ-परंपरा का सर्वोच्च पीठ — मान्यता है कि नीलाचल पर्वत पर सती की योनि (महामुद्रा) गिरी। गर्भगृह में मूर्ति नहीं, योनि-आकार शिला और प्राकृतिक जलस्रोत पूजित है; अंबुबाची मेला, दस महाविद्या परिसर और उमानंद भैरव इस पीठ की पहचान हैं।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
ललिता (प्रयाग)
✦ ललिता
📍 प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
मान्यता है कि तीर्थराज प्रयाग में सती के हाथ की अंगुलियाँ गिरीं; देवी ललिता रूप में और भैरव भव रूप में पूजित। ललिता देवी, अलोपी देवी (मूर्तिविहीन डोली-पूजा) और कल्याणी देवी — तीन देवी-स्थान इस पीठ से जुड़े हैं; कुंभ-माघ मेले की भूमि का शक्तिपीठ।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
जयंती
✦ जयंती
📍 जयंतिया अंचल (मेघालय–सिलहट सीमा क्षेत्र)
परंपरा के अनुसार जयंतिया अंचल में सती की वाम जंघा गिरी; देवी जयंती रूप में और भैरव क्रमदीश्वर रूप में पूजित। नरतियांग (मेघालय) और कालाजोर (सिलहट) — दोनों की मान्यताएँ जीवित हैं; जनजातीय संस्कृति और शाक्त परंपरा के संगम का विरल पीठ।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
भूतधात्री (युगाद्या)
✦ भूतधात्री (युगाद्या)
📍 क्षीरग्राम, मंगलकोट, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि क्षीरग्राम में सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा; देवी युगाद्या (भूतधात्री) रूप में और भैरव क्षीरखंडक रूप में पूजित। वैशाख संक्रांति का युगाद्या-उत्सव और जल में वास करने वाले विग्रह की परंपरा इस बर्धमान-अंचल पीठ की पहचान है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
कालिका (कालीघाट)
✦ दक्षिणा कालिका
📍 कालीघाट, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि आदि गंगा के तट पर सती के दाहिने पैर की अंगुलियाँ गिरीं — यही कालीघाट का कालीपीठ है। देवी दक्षिणा कालिका रूप में (कसौटी-पाषाण मुख, स्वर्ण-जिह्वा) और भैरव नकुलीश रूप में पूजित; बंगाल की काली-उपासना और कोलकाता की पहचान का केंद्र।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
विमला (किरीट)
✦ विमला (भुवनेशी)
📍 किरीटकोणा, मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल
यहाँ सती का अंग नहीं, किरीट (मुकुट) गिरने की मान्यता है — इसीलिए कुछ परंपराएँ इसे "उपपीठ" कहती हैं। देवी विमला (भुवनेशी) रूप में, भैरव संवर्त रूप में पूजित। मुर्शिदाबाद के किरीटकोणा गाँव की यह स्थली नवाबी बंगाल के इतिहास से भी जुड़ी है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
विशालाक्षी (काशी)
✦ विशालाक्षी
📍 मीरघाट, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
मान्यता है कि काशी में सती का कर्ण-कुंडल गिरा — मणिकर्णिका नाम की परंपरा इसी से जुड़ती है। मीरघाट पर विशाल नेत्रों वाली देवी विशालाक्षी विराजती हैं; भैरव-स्थान काशी के कोतवाल कालभैरव को प्राप्त है। उत्तर-दक्षिण साझा श्रद्धा का विरल देवी-मंदिर।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
सर्वाणी (कन्याश्रम)
✦ सर्वाणी (कन्याकुमारी)
📍 कन्याकुमारी, तमिलनाडु
भारत के दक्षिणतम बिंदु पर — तीन समुद्रों के संगम — मान्यता है कि सती का पृष्ठ-भाग गिरा; देवी सर्वाणी (कन्याकुमारी) रूप में और भैरव निमिष रूप में पूजित। कुमारी-तप की कथा और हीरक नथ की आभा वाला यह पीठ शक्तिपीठ-परंपरा का दक्षिणी ध्रुव है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
सावित्री (कुरुक्षेत्र)
✦ सावित्री (भद्रकाली)
📍 थानेसर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा
मान्यता है कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में सती के दाहिने पैर का गुल्फ (टखना) गिरा; देवी सावित्री (भद्रकाली) रूप में देवीकूप में और भैरव स्थाणु रूप में पूजित। महाभारत-स्मृति और मन्नत पर अश्व अर्पित करने की अनोखी लोक-रीति इस पीठ की पहचान है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
गायत्री (मणिवेदिका)
✦ गायत्री
📍 पुष्कर, अजमेर, राजस्थान
परंपरा के अनुसार तीर्थराज पुष्कर में सती के मणिबंध (कलाइयाँ) गिरे — इसी से पीठ "मणिवेदिका" कहलाया; देवी गायत्री रूप में और भैरव सर्वानंद रूप में पूजित। ब्रह्मा के विरल मंदिर, बावन घाटों के सरोवर और कार्तिक पूर्णिमा मेले की भूमि का शक्तिपीठ।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
महालक्ष्मी (श्रीशैल)
✦ महालक्ष्मी
📍 श्रीशैल क्षेत्र, सिलहट
मान्यता है कि श्रीशैल पीठ पर सती की ग्रीवा (गला) गिरी; देवी महालक्ष्मी रूप में और भैरव शंबरानंद रूप में पूजित। "श्रीशैल" नाम की दो जीवित पहचानें हैं — सिलहट (बांग्लादेश) की बंगाल-परंपरा और श्रीशैलम (आंध्र) की मल्लिकार्जुन-भ्रमरांबा परंपरा; दोनों अंकित हैं।
मतभेद उपलब्धदर्शन व कथा →
देवगर्भा (कांची)
✦ देवगर्भा
📍 कांकालीतला, बोलपुर क्षेत्र, बीरभूम, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि कोपाई नदी के तट पर सती की अस्थि (कंकाल-भाग) गिरी — इसी से स्थान कांकालीतला कहलाया। देवी देवगर्भा रूप में, भैरव रुरु रूप में पूजित; मंदिर-पार्श्व का कुंड ही पीठ का मूल स्थान माना जाता है। शांतिनिकेतन अंचल का शाक्त तीर्थ।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
काली (कालमाधव)
✦ काली
📍 मध्य भारत (नर्मदा-अंचल की एक मान्यता) — स्थान अनिश्चित
सूची-परंपरा के अनुसार कालमाधव पीठ पर सती का वाम नितंब गिरा; देवी काली रूप में और भैरव असितांग रूप में पूजित माने गए। आधुनिक स्थान की पहचान निश्चित नहीं — मध्य भारत (अमरकंटक अंचल) की एक मान्यता है; सत्यापन शोधाधीन है।
स्थान सत्यापन लंबितदर्शन व कथा →
नर्मदा (शोणदेश)
✦ नर्मदा (शोणाक्षी)
📍 अमरकंटक, अनूपपुर, मध्य प्रदेश
मान्यता है कि शोणदेश — शोण नद के उद्गम-क्षेत्र अमरकंटक — में सती का दक्षिण नितंब गिरा; देवी नर्मदा (शोणाक्षी) रूप में और भैरव भद्रसेन रूप में पूजित। नर्मदा-शोण के उद्गम की इस भूमि से नर्मदा-परिक्रमा की महान परंपरा जुड़ी है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
शिवानी (रामगिरि)
✦ शिवानी
📍 चित्रकूट-अंचल की परंपरा — पहचान पर मतभेद
सूची-परंपरा के अनुसार रामगिरि पीठ पर सती का दक्षिण स्तन गिरा; देवी शिवानी रूप में और भैरव चंड रूप में पूजित। "रामगिरि" की पहचान पर मतभेद है — चित्रकूट, रामटेक और (स्तन-पीठ रूप में) ओडिशा की तारातारिणी — तीनों क्षेत्रीय मान्यताएँ जीवित हैं।
मतभेद उपलब्धदर्शन व कथा →
उमा (वृंदावन)
✦ उमा (कात्यायनी)
📍 वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश
मान्यता है कि ब्रज-भूमि वृंदावन में सती के केश-गुच्छ (चूड़ामणि सहित) गिरे; देवी उमा — कात्यायनी — रूप में और भैरव भूतेश रूप में पूजित। गोपियों के कात्यायनी-व्रत की भागवत-परंपरा से जुड़ा राधाबाग का यह पीठ वैष्णव-भूमि में शाक्त धारा का संगम है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
नारायणी (शुचि)
✦ नारायणी
📍 शुचीन्द्रम, कन्याकुमारी जिला, तमिलनाडु
परंपरा के अनुसार शुचि-तीर्थ (शुचीन्द्रम) में सती के ऊपरी दाँत गिरे; देवी नारायणी रूप में और भैरव संहार रूप में पूजित। स्थाणुमालयन मंदिर की त्रिमूर्ति-उपासना, संगीतमय पाषाण-स्तंभ और विशाल हनुमान-प्रतिमा इस पीठ-नगरी की पहचान हैं।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
वाराही (पंचसागर)
✦ वाराही
📍 स्थान अनिश्चित — परंपरा-भेद
सूची-परंपरा में पंचसागर पीठ पर सती के निचले दाँत गिरने की मान्यता है; देवी वाराही रूप में और भैरव महारुद्र रूप में पूजित माने गए। "पंचसागर" स्थान की आधुनिक पहचान सर्वमान्य नहीं — सत्यापन शोधाधीन है; वाराही की मातृका-परंपरा अंकित है।
स्थान सत्यापन लंबितदर्शन व कथा →
अपर्णा (करतोयातट)
✦ अपर्णा
📍 भवानीपुर, शेरपुर (बगुड़ा अंचल)
मान्यता है कि करतोया नदी के तट पर सती के बाएँ पैर का तल्प (नूपुर-आभूषण सहित भाग) गिरा; देवी अपर्णा रूप में और भैरव वामन रूप में पूजित। बगुड़ा (बांग्लादेश) के भवानीपुर की यह स्थली प्राचीन पुंड्रवर्धन सभ्यता की छाया में बसा तीर्थ है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
श्री सुंदरी (श्रीपर्वत)
✦ श्री सुंदरी
📍 लद्दाख की परंपरा / श्रीशैलम की परंपरा — मतभेद
सूची-परंपरा के अनुसार श्रीपर्वत पीठ पर सती के दाएँ पैर का तल्प (नूपुर-भाग) गिरा; देवी श्री सुंदरी रूप में और भैरव सुंदरानंद रूप में पूजित। "श्रीपर्वत" की पहचान पर मतभेद है — लद्दाख की हिमालयी परंपरा और श्रीशैलम (नल्लमला) की दक्षिण-परंपरा, दोनों अंकित हैं।
मतभेद उपलब्धदर्शन व कथा →
कपालिनी (विभाष)
✦ कपालिनी (भीमरूपा)
📍 तामलुक, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि विभाष क्षेत्र — आज के तामलुक — में सती के बाएँ पैर का गुल्फ गिरा; देवी कपालिनी (भीमरूपा/बर्गभीमा) रूप में और भैरव सर्वानंद रूप में पूजित। प्राचीन ताम्रलिप्ति बंदरगाह-नगरी की यह देवी-स्थली इतिहास और श्रद्धा का संगम है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
चंद्रभागा (प्रभास)
✦ चंद्रभागा
📍 प्रभास क्षेत्र (सोमनाथ-वेरावल), गुजरात
परंपरा के अनुसार प्रभास क्षेत्र में सती का उदर गिरा; देवी चंद्रभागा रूप में और भैरव वक्रतुंड रूप में पूजित। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की इस तीर्थ-भूमि में चंद्र-कथा, त्रिवेणी-संगम और सागर-तट की परंपरा शक्तिपीठ-मान्यता के साथ गुँथी है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
अवंती (भैरवपर्वत)
✦ अवंती
📍 भैरवगढ़, क्षिप्रा तट, उज्जैन, मध्य प्रदेश
मान्यता है कि क्षिप्रा-तट के भैरवपर्वत पर सती का ऊपरी होंठ गिरा; देवी अवंती रूप में और भैरव लंबकर्ण रूप में पूजित। महाकाल की नगरी उज्जैन — हरसिद्धि, कालभैरव और सिंहस्थ कुंभ की भूमि — का यह पीठ शिव-शक्ति-भैरव त्रयी का संगम है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
भ्रामरी (जनस्थान)
✦ भ्रामरी
📍 नासिक, गोदावरी तट, महाराष्ट्र
परंपरा के अनुसार गोदावरी-तट के जनस्थान — नासिक क्षेत्र — में सती की चिबुक (ठोड़ी) गिरी; देवी भ्रामरी रूप में और भैरव विकृताक्ष रूप में पूजित। पंचवटी की राम-कथा भूमि, गोदावरी और सिंहस्थ कुंभ की यह नगरी शक्ति-उपासना से भी समृद्ध है।
व्यापक प्रचलित मान्यतादर्शन व कथा →
विश्वेश्वरी (सर्वशैल)
✦ विश्वेश्वरी (राकिनी)
📍 कोटिलिंगेश्वर घाट क्षेत्र, राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी), आंध्र प्रदेश
मान्यता है कि गोदावरी-तट के सर्वशैल क्षेत्र में सती का कपोल (गाल) गिरा; देवी विश्वेश्वरी (राकिनी) रूप में और भैरव वत्सनाभ रूप में पूजित। राजमहेंद्रवरम के कोटिलिंगेश्वर घाट अंचल की यह परंपरा गोदावरी पुष्करम स्नान-पर्व की भूमि से जुड़ी है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
अंबिका (बिराट)
✦ अंबिका
📍 विराटनगरी (बैराठ-भरतपुर अंचल), राजस्थान — मतभेद
सूची-परंपरा के अनुसार बिराट क्षेत्र में सती के बाएँ पैर की अंगुलियाँ गिरीं; देवी अंबिका रूप में और भैरव अमृतेश्वर रूप में पूजित। महाभारत की विराट-भूमि (पांडवों के अज्ञातवास की स्थली) से जुड़ी इस पीठ की स्थल-पहचान पर मतभेद अंकित है।
मतभेद उपलब्धदर्शन व कथा →
कुमारी (रत्नावली)
✦ कुमारी
📍 खानाकुल-कृष्णनगर, हुगली, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि रत्नावली क्षेत्र में सती का दायाँ कंधा (दक्षिण स्कंध) गिरा; देवी कुमारी रूप में और भैरव शिव (घंटेश्वर) रूप में पूजित। हुगली जिले के खानाकुल अंचल की यह स्थली कुमारी-पूजन परंपरा की पीठ-रूप प्रतिष्ठा मानी जाती है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
उमा (मिथिला)
✦ उमा (महादेवी)
📍 मिथिला अंचल (जनकपुर–उच्चैठ की परंपराएँ) — मतभेद
सूची-परंपरा के अनुसार मिथिला में सती का बायाँ कंधा (वाम स्कंध) गिरा; देवी उमा (महादेवी) रूप में और भैरव महोदर रूप में पूजित। सीता की जन्मभूमि मिथिला की इस पीठ-परंपरा की पहचान पर मतभेद है — जनकपुर और उच्चैठ, दोनों मान्यताएँ जीवित हैं।
मतभेद उपलब्धदर्शन व कथा →
कालिका (नलहाटी)
✦ कालिका (नलाटेश्वरी)
📍 नलहाटी, बीरभूम, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि नलहाटी में सती की कंठनली (नला) गिरी — इसी से नगर का नाम नलहाटी और देवी का नाम नलाटेश्वरी पड़ा। देवी कालिका रूप में पहाड़ी-मंदिर की सिंदूर-मंडित शिला में पूजित हैं; भैरव योगीश रूप में। बीरभूम की पीठ-श्रृंखला और तारापीठ-अंचल का तीर्थ।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
जयदुर्गा (कर्णाट)
✦ जयदुर्गा
📍 स्थान अनिश्चित — परंपरा-भेद
सूची-परंपरा में कर्णाट पीठ पर सती के दोनों कान (कर्णद्वय) गिरने की मान्यता है; देवी जयदुर्गा रूप में और भैरव अभिरु रूप में पूजित माने गए। "कर्णाट" स्थान की आधुनिक पहचान सर्वमान्य नहीं — सत्यापन शोधाधीन; श्रवण-भक्ति की प्रतीक-परंपरा अंकित है।
स्थान सत्यापन लंबितदर्शन व कथा →
महिषमर्दिनी (वक्त्रेश्वर)
✦ महिषमर्दिनी
📍 बक्रेश्वर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि वक्त्रेश्वर — आज के बक्रेश्वर — में सती का भ्रूमध्य (परंपरा में "मन") गिरा; देवी महिषमर्दिनी रूप में और भैरव वक्त्रनाथ रूप में पूजित। प्राकृतिक उष्ण जलकुंडों (अग्निकुंड आदि) की यह तीर्थ-भूमि बीरभूम की पीठ-श्रृंखला का विशिष्ट स्थान है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
यशोरेश्वरी (यशोर)
✦ यशोरेश्वरी
📍 ईश्वरीपुर, श्यामनगर, सातखीरा
मान्यता है कि यशोर क्षेत्र में सती के करतल (हथेलियाँ) गिरे; देवी यशोरेश्वरी रूप में और भैरव चंड रूप में पूजित। सातखीरा (बांग्लादेश) के ईश्वरीपुर की यह स्थली राजा प्रतापादित्य के संरक्षण की ऐतिहासिक स्मृति और सुंदरवन-अंचल की जीवित श्रद्धा का पीठ है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
फुल्लरा (अट्टहास)
✦ फुल्लरा
📍 अट्टहास (लाभपुर अंचल), पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि अट्टहास में सती का अधरोष्ठ (निचला होंठ) गिरा; देवी फुल्लरा रूप में और भैरव विश्वेश रूप में पूजित। लाभपुर (बीरभूम अंचल) का यह पीठ चंडीमंगल काव्य की फुल्लरा-परंपरा और लोक-साहित्य से जुड़ा विरल साहित्य-सिंचित तीर्थ है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
नंदिनी (नंदीपुर)
✦ नंदिनी
📍 सैंथिया, बीरभूम, पश्चिम बंगाल
मान्यता है कि नंदीपुर (आज के सैंथिया) में सती का कंठहार गिरा — अंग नहीं, आभूषण; इसीलिए यह विशिष्ट परंपरा का पीठ है। देवी नंदिनी रूप में विशाल प्राचीन वट-वृक्ष तले पूजित हैं और भैरव नंदिकेश्वर रूप में। बीरभूम के सैंथिया नगर की जीवित देवी-स्थली।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →
इंद्राक्षी (लंका)
✦ इंद्राक्षी
📍 श्रीलंका (त्रिंकोमली की परंपरा) — निश्चित स्थल अनिर्णीत
सूची-परंपरा के अनुसार लंका में सती का नूपुर (पायल) गिरा; देवी इंद्राक्षी रूप में और भैरव राक्षसेश्वर रूप में पूजित। प्रचलित परंपरा त्रिंकोमली की शंकरी देवी ("लंकायां शांकरी") से जोड़ती है, पर प्राचीन स्थल अनिर्णीत है — समुद्र-पार का यह पीठ शोधाधीन है।
स्थान सत्यापन लंबितदर्शन व कथा →
महालक्ष्मी (करवीर)
✦ महालक्ष्मी (अंबाबाई)
📍 कोल्हापुर, महाराष्ट्र
महाराष्ट्र-दक्षिण की परंपरा करवीर — कोल्हापुर — को शक्तिपीठ मानती है; अष्टादश-पीठ परंपरा के अनुसार यहाँ सती के नेत्र (त्रिनेत्र) गिरे। देवी महालक्ष्मी (अंबाबाई) चालुक्य-कालीन मंदिर में विराजती हैं; किरणोत्सव — जब सूर्य-किरणें सीधे विग्रह तक पहुँचती हैं — विश्वप्रसिद्ध है।
क्षेत्रीय परंपरादर्शन व कथा →