सामवेद
सामवेदः
संगीत और गान का वेद, देवताओं के स्तुति गीत
पढ़ने का समय
180 मिनट
श्लोक/आयत
1875
अध्याय/भाग
4
काल अनुमान
ईसा पूर्व 1200-1000
लेखक
जैमिनि ऋषि और अन्य ऋषि
स्रोत
वैदिक परंपरा
सामवेदः
संगीत और गान का वेद, देवताओं के स्तुति गीत
पढ़ने का समय
180 मिनट
श्लोक/आयत
1875
अध्याय/भाग
4
काल अनुमान
ईसा पूर्व 1200-1000
लेखक
जैमिनि ऋषि और अन्य ऋषि
स्रोत
वैदिक परंपरा
सामवेद को गान का वेद कहा जाता है — इसके अधिकांश मंत्र मूलतः ऋग्वेद से लिए गए हैं, पर उन्हें स्वरबद्ध कर गायन-योग्य रूप दिया गया है। भारतीय संगीत-परंपरा की जड़ें सामगान से जुड़ी मानी जाती हैं। सामवेद की प्रमुख शाखाएँ कौथुम, राणायनीय और जैमिनीय हैं। यज्ञ में सामवेद के मंत्रों का गान करने वाला पुरोहित 'उद्गाता' कहलाता है, जो अपने गायन से यज्ञ-वातावरण को भाव-मय बनाता है। सामवेद से जुड़े ब्राह्मण ग्रंथ ताण्ड्य (पंचविंश) और जैमिनीय हैं, जबकि उपनिषद-परंपरा में छांदोग्य और केन उपनिषद इसी से जुड़े हैं — छांदोग्य में प्रसिद्ध महावाक्य 'तत्त्वमसि' और उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद मिलता है। सामवेद के प्रमुख सूक्तों-मंत्रों में 'अग्न आ याहि', पवमान सोम की स्तुतियाँ और उद्गीथ (ॐ) की उपासना प्रमुख हैं। इस वेद की केंद्रीय शिक्षा है — स्वर साधना ही उपासना है; गान के माध्यम से भक्ति और एकाग्रता का मार्ग। वर्तमान समय में सामवेद का महत्व भजन-कीर्तन की संस्कृति, नाद-योग और भारत की समृद्ध ध्वनि-धरोहर के रूप में देखा जाता है। यह वेद दिखाता है कि सनातन परंपरा में ज्ञान केवल तर्क या पाठ से नहीं, स्वर और लय से भी अभिव्यक्त होता रहा है।
🕉️ सामवेद की पूरी संरचना, शाखाएँ, ऋषि-परंपरा और मूल संहिता-पाठ के विस्तृत अध्ययन के लिए समर्पित खंड देखें।
विस्तार से पढ़ें →अधिकांश मंत्र मूलतः ऋग्वेद से ही लिए गए हैं, पर सामवेद ने उन्हें विशिष्ट स्वर-विधान देकर गायन-योग्य रूप में ढाला।
यह छांदोग्य उपनिषद का महावाक्य है, जो सामवेद-परंपरा से जुड़ा है और उद्दालक-श्वेतकेतु के संवाद में आता है।
उद्गाता यज्ञ में सामवेद के मंत्रों का गायन करता है, जो यज्ञ के वातावरण को भाव-मय और उपासनामय बनाता है।
सामगान को भारतीय शास्त्रीय संगीत-परंपरा की प्राचीनतम जड़ों में से एक माना जाता है, यद्यपि सामगान की मूल पाठ-शैली आज के शास्त्रीय संगीत से भिन्न भी है।