सनातन ज्ञान
हिंदू धर्म · ज्ञान संसार
🔍 खोजेंनित्य कर्मचार वेदवेद18 महापुराण + 18 उपपुराणपुराणउपनिषद24 अवतारऋषि-मुनि ज्ञानकोशदेव-देवी ज्ञानकोशश्रीराम कथाश्रीकृष्ण कथाचार धामज्योतिर्लिंग52 शक्तिपीठशास्त्र पुस्तकालयग्रंथ संसारइतिहासमंत्रमंत्र एवं स्तुतियाँपाठ — सुंदरकांड आदिश्रवणपूजा विधिपर्व-त्योहार16 संस्कारपरंपराअखाड़े व सम्प्रदायपवित्र नदियाँपवित्र वृक्षगोत्र-प्रवरसमाधान (100 प्रश्नोत्तर)सनातन संवाद🔍 खोजेंनित्य कर्मचार वेदवेद18 महापुराण + 18 उपपुराणपुराणउपनिषद24 अवतारऋषि-मुनि ज्ञानकोशदेव-देवी ज्ञानकोशश्रीराम कथाश्रीकृष्ण कथाचार धामज्योतिर्लिंग52 शक्तिपीठशास्त्र पुस्तकालयग्रंथ संसारइतिहासमंत्रमंत्र एवं स्तुतियाँपाठ — सुंदरकांड आदिश्रवणपूजा विधिपर्व-त्योहार16 संस्कारपरंपराअखाड़े व सम्प्रदायपवित्र नदियाँपवित्र वृक्षगोत्र-प्रवरसमाधान (100 प्रश्नोत्तर)सनातन संवाद
शास्त्र पुस्तकालय · स्मृति-सूत्र

स्मृतियाँ

धर्मशास्त्र-ग्रंथ — ऐतिहासिक सामाजिक संहिताएँ

स्मृति का अर्थ है "स्मरण किया हुआ" — श्रुति (वेद) के बाद की वह ग्रंथ-परंपरा जिसमें ऋषियों ने अपने-अपने युग के अनुसार आचार, व्यवहार (विधि) और प्रायश्चित्त के नियम संकलित किए। स्मृतियाँ ऐतिहासिक दस्तावेज हैं — वे अपने रचना-काल के समाज की व्यवस्था दर्शाती हैं। परंपरा स्वयं मानती रही है कि स्मृतियाँ देश-काल-सापेक्ष हैं: प्रत्येक युग की अपनी स्मृति-व्यवस्था कही गई है और परस्पर विरोध की स्थिति में श्रुति को ही प्रमाण माना गया। आज इनका अध्ययन मुख्यतः ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्रोत के रूप में होता है, न कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के विधान के रूप में।

प्रमुख स्मृतियाँ

मनुस्मृति

12 अध्याय, लगभग 2,684 श्लोक — सृष्टि, संस्कार, आश्रम-धर्म, राजधर्म, व्यवहार और प्रायश्चित्त। धर्मशास्त्र-परंपरा में व्यापक रूप से उद्धृत; इसकी सामाजिक व्यवस्था-संबंधी मान्यताओं पर आधुनिक काल में गंभीर पुनर्विचार और आलोचना हुई है — यह ऐतिहासिक स्रोत के रूप में प्रस्तुत है।

याज्ञवल्क्य स्मृति

तीन कांड — आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त; संक्षिप्त और व्यवस्थित शैली। विज्ञानेश्वर की "मिताक्षरा" टीका मध्यकालीन और ब्रिटिशकालीन हिंदू विधि का प्रमुख आधार बनी।

पराशर स्मृति

परंपरा में "कलियुग की स्मृति" कही गई — युग-अनुकूल सरल आचार-व्यवस्था पर बल; कृषि-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि उल्लेखनीय।

नारद स्मृति

लगभग पूर्णतः व्यवहार (न्याय-विधि) पर केंद्रित — साक्ष्य, ऋण, संपत्ति-विवाद जैसे 18 विवाद-पद; प्राचीन भारतीय न्याय-प्रक्रिया का महत्वपूर्ण स्रोत।

आधुनिक संदर्भ

स्मृति-साहित्य को समझते समय तीन बातें ध्यान रखने योग्य हैं: (1) स्मृतियाँ अनेक हैं और परस्पर भिन्न मत रखती हैं — कोई एक "अंतिम" संहिता नहीं; (2) परंपरा में देश-काल के अनुसार निर्णय (निबंध-ग्रंथ, परिषद्-व्यवस्था) का स्थान सदा रहा; (3) वर्तमान भारतीय समाज और विधि संविधान से शासित हैं। इस खंड का उद्देश्य ऐतिहासिक ज्ञान-परंपरा का परिचय है, किसी सामाजिक व्यवस्था का समर्थन नहीं।

ऐतिहासिक स्रोतपरिचय उपलब्ध

🔎 थोड़ा और गहराई से

स्मृति-ग्रंथों को पढ़ते समय सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि ये ऐतिहासिक-सांस्कृतिक दस्तावेज हैं, जो अपने-अपने रचना-काल के समाज, आचार-व्यवहार और न्याय-प्रक्रिया को प्रतिबिंबित करते हैं — वर्तमान भारतीय समाज और विधि-व्यवस्था संविधान से शासित होती है, स्मृतियों से नहीं। परंपरा स्वयं यह सिद्धांत मानती रही है कि प्रत्येक युग की अपनी स्मृति-व्यवस्था होती है, और यदि स्मृतियों में परस्पर विरोध हो तो श्रुति (वेद) को ही अंतिम प्रमाण माना गया। यही कारण है कि मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति और नारद स्मृति में विषय-वस्तु और दृष्टिकोण में अंतर मिलता है — मनुस्मृति व्यापक आचार-संहिता है, याज्ञवल्क्य स्मृति अधिक संक्षिप्त और संगठित शैली में है (विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका के माध्यम से मध्यकालीन विधि-व्यवस्था में प्रभावशाली रही), पराशर स्मृति को परंपरा में कलियुग-अनुकूल सरल स्मृति कहा गया, और नारद स्मृति लगभग पूर्णतः न्याय-प्रक्रिया पर केंद्रित है। मनुस्मृति की कुछ सामाजिक मान्यताओं पर आधुनिक काल में गंभीर अकादमिक और सामाजिक पुनर्विचार व आलोचना हुई है, जिसे इस खंड में ऐतिहासिक स्रोत के रूप में प्रस्तुत सामग्री में स्वीकार करना आवश्यक है। स्मृतियों का अध्ययन आज मुख्यतः भारतीय सामाजिक-इतिहास और विधि-इतिहास की खिड़की के रूप में सार्थक है।

🔑 मुख्य बातें

  • स्मृतियाँ अपने रचना-काल के समाज व आचार-व्यवस्था को दर्शाने वाले ऐतिहासिक-धर्मशास्त्रीय दस्तावेज हैं, वर्तमान विधि-ग्रंथ नहीं।
  • वर्तमान भारतीय समाज व कानून-व्यवस्था संविधान से शासित है, प्राचीन स्मृतियों से नहीं।
  • परंपरा स्वयं मानती है कि स्मृति देश-काल-सापेक्ष है और विरोध की स्थिति में श्रुति (वेद) प्रमाण है।
  • मनुस्मृति की कुछ सामाजिक मान्यताओं पर आधुनिक काल में गंभीर आलोचना व पुनर्विचार हुआ है।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति पर मिताक्षरा टीका मध्यकालीन हिंदू विधि की प्रमुख आधार-टीका बनी।

प्रश्नोत्तर

क्या स्मृतियाँ आज भी भारत में कानून के रूप में लागू होती हैं?

नहीं, वर्तमान भारतीय विधि-व्यवस्था पूर्णतः भारत के संविधान और आधुनिक कानूनों से शासित होती है; स्मृतियाँ ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अध्ययन का विषय हैं।

यदि विभिन्न स्मृतियों में परस्पर विरोध हो तो कौन-सी मान्य है?

परंपरा में यह सिद्धांत रहा है कि टकराव की स्थिति में श्रुति (वेद) को ही अंतिम प्रमाण माना जाए; कोई एक स्मृति "सर्वोपरि" नहीं मानी गई।

मनुस्मृति की सभी बातें आज भी मान्य मानी जाती हैं क्या?

नहीं, इसकी अनेक सामाजिक मान्यताओं पर आधुनिक विद्वानों और समाज में गंभीर आलोचना व पुनर्विचार हुआ है; इस पोर्टल पर इसे ऐतिहासिक स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

🔗 संबंधित पृष्ठ