सनातन ज्ञान
हिंदू धर्म · ज्ञान संसार
🔍 खोजेंनित्य कर्मचार वेदवेद18 महापुराण + 18 उपपुराणपुराणउपनिषद24 अवतारऋषि-मुनि ज्ञानकोशदेव-देवी ज्ञानकोशश्रीराम कथाश्रीकृष्ण कथाचार धामज्योतिर्लिंग52 शक्तिपीठशास्त्र पुस्तकालयग्रंथ संसारइतिहासमंत्रमंत्र एवं स्तुतियाँपाठ — सुंदरकांड आदिश्रवणपूजा विधिपर्व-त्योहार16 संस्कारपरंपराअखाड़े व सम्प्रदायपवित्र नदियाँपवित्र वृक्षगोत्र-प्रवरसमाधान (100 प्रश्नोत्तर)सनातन संवाद🔍 खोजेंनित्य कर्मचार वेदवेद18 महापुराण + 18 उपपुराणपुराणउपनिषद24 अवतारऋषि-मुनि ज्ञानकोशदेव-देवी ज्ञानकोशश्रीराम कथाश्रीकृष्ण कथाचार धामज्योतिर्लिंग52 शक्तिपीठशास्त्र पुस्तकालयग्रंथ संसारइतिहासमंत्रमंत्र एवं स्तुतियाँपाठ — सुंदरकांड आदिश्रवणपूजा विधिपर्व-त्योहार16 संस्कारपरंपराअखाड़े व सम्प्रदायपवित्र नदियाँपवित्र वृक्षगोत्र-प्रवरसमाधान (100 प्रश्नोत्तर)सनातन संवाद
52 शक्तिपीठ

भूतधात्री (युगाद्या)

52 शक्तिपीठ में क्रम 20 — क्षीरग्राम, मंगलकोट, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बंगाल

भूतधात्री (युगाद्या)

भूतधात्री (युगाद्या)

📍 क्षीरग्राम, मंगलकोट, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बंगाल

✨ एक झलक

मान्यता है कि क्षीरग्राम में सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा; देवी युगाद्या (भूतधात्री) रूप में और भैरव क्षीरखंडक रूप में पूजित। वैशाख संक्रांति का युगाद्या-उत्सव और जल में वास करने वाले विग्रह की परंपरा इस बर्धमान-अंचल पीठ की पहचान है।

🛕 पीठ-परिचय

क्षेत्रीय परंपरा
देवी (शक्ति) रूपभूतधात्री (युगाद्या)
भैरवक्षीरखंडक
गिरा अंग/आभूषणदक्षिण पाद-अंगुष्ठ
आधुनिक स्थानक्षीरग्राम, मंगलकोट, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बंगाल
देशभारत

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

🪔 दक्ष-यज्ञ से इस पीठ तक

दक्ष-यज्ञ की कथा के उपसंहार में, जब सती-देह के अंग बंगाल की धरती पर उतर रहे थे, परंपरा कहती है कि दाहिने पैर का अंगूठा बर्धमान अंचल के एक गाँव में गिरा — और वह गाँव सदा के लिए "क्षीरग्राम" हो गया। पैर का अंगूठा छोटा-सा अंग है, पर परंपरा उसकी महिमा जानती है: गंगावतरण की कथा में विष्णु के पाद-अंगुष्ठ से ही गंगा फूटी मानी गई हैं। अंगुष्ठ-पीठ की देवी छोटे-में-बड़े का रहस्य हैं — लोक कहता है कि माँ के चरण का कण भी मिले तो भाग्य पूरा।

यहाँ देवी का नाम ही उनकी व्याख्या है — युगाद्या, अर्थात युग के आदि से विद्यमान; और भूतधात्री, अर्थात समस्त प्राणियों (भूतों) को धारण करने वाली धात्री। ये दोनों नाम मिलकर देवी को काल और करुणा — दोनों की स्वामिनी बताते हैं। भैरव क्षीरखंडक कहलाते हैं, और गाँव का नाम क्षीरग्राम — दूध-धवल पवित्रता का यह नाम-सूत्र स्थानीय रीति से भी जुड़ा है: देवी को क्षीर (खीर) का भोग विशेष प्रिय माना जाता है, और पर्वों पर घर-घर से खीर का नैवेद्य मंदिर पहुँचता है।

🛕 देवी, भैरव और स्थान

इस पीठ की सबसे विलक्षण परंपरा देवी के जल-वास की है। युगाद्या का विग्रह वर्ष के अधिकांश समय मंदिर-कुंड के जल में विराजमान माना जाता है — मानो देवी धरती की आर्द्रता में विश्राम करती हों। वैशाख संक्रांति के युगाद्या-उत्सव पर विग्रह को विधिपूर्वक जल से बाहर लाकर दर्शन कराया जाता है, और उत्सव के उपरांत पुनः जल में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है। दर्शन की यह दुर्लभता ही इस पीठ का उत्सव-रस है: वर्ष भर की प्रतीक्षा के बाद वह एक झलक, जिसके लिए दूर-दूर के गाँवों से जनसमूह उमड़ता है। संक्रांति के मेले में बर्धमान अंचल की पूरी लोक-संस्कृति — कीर्तन, बाउल, पट-चित्र, ग्रामीण हाट — जीवंत हो उठती है।

क्षीरग्राम जिस मंगलकोट क्षेत्र में है, वह बंगाल के इतिहास-भूगोल का समृद्ध अंचल है — अजय और कुनूर नदियों का दोआब, जहाँ प्राचीन बस्तियों के अवशेष और सूफी-वैष्णव-शाक्त तीनों धाराओं की स्मृतियाँ मिलती हैं। बंगाल के मंगलकाव्य साहित्य में युगाद्या का उल्लेख इस पीठ की लोक-प्रतिष्ठा की प्राचीनता बताता है — कवियों ने देवी-वंदनाओं में क्षीरग्राम की माता को स्मरण किया है। यह साहित्य-साक्ष्य बताता है कि सदियों पहले भी यह पीठ बंगाल की धर्म-चेतना में जीवित था।

ग्राम-जीवन में देवी की उपस्थिति यहाँ रोज़मर्रा की है। फसल की पहली उपज का अर्पण, विवाह से पहले देवी का निमंत्रण, संतान के अन्नप्राशन में माँ का आशीर्वाद — युगाद्या क्षीरग्राम की कुल-माता हैं। दुर्गापूजा और काली पूजा के साथ-साथ मंगलवार-शनिवार की साप्ताहिक पूजा की रीति चलती है। मंदिर का स्वरूप सादा है — पर वैशाखी उत्सव के दिन जब सहस्रों दीप जलते हैं और जल से निकली देवी का शृंगार होता है, तब यह छोटा-सा गाँव बंगाल के बड़े-से-बड़े तीर्थ की आभा पा लेता है।

🎉 परंपरा, पर्व और भाव

प्रतीक्षा इस पीठ की साधना है। वैशाख बीतते ही गाँव अगली संक्रांति की बाट जोहने लगता है — दादी-नानी बच्चों को जल में विराजी देवी की कथा सुनाती हैं, और वर्ष भर यह प्रतीक्षा ही घर-घर की भक्ति बनी रहती है। उत्सव की पूर्व-संध्या पर मंदिर-प्रांगण में रातभर कीर्तन चलता है; सेवायत-परिवार विधि-निष्ठा से विग्रह के जल-निकास और शृंगार की परंपरा निभाते हैं, जो पीढ़ियों से उन्हीं घरानों के पास है। मेले में आए अपरिचित यात्रियों को गाँव के घर अन्न-जल देना पुण्य मानते हैं — अतिथि-सेवा की यह रीति क्षीरग्राम के नाम की मिठास को सार्थक करती है। छोटे-से गाँव की यह बड़ी व्यवस्था बताती है कि परंपरा केवल पुजारियों से नहीं, पूरे लोक के अनुशासन से जीवित रहती है।

युगाद्या पीठ की कथा का मर्म उसके नाम-युग्म में है: जो युग के आदि से है (युगाद्या), वही सबको धारण करती है (भूतधात्री)। समय की अनंतता और ममता की तत्परता — दोनों एक ही माता में। जल में विश्राम करती देवी वर्ष में एक दिन दर्शन देकर मानो यह स्मरण कराती हैं कि दिव्यता सदा प्रकट नहीं रहती, पर सदा उपस्थित रहती है। क्षीरग्राम का भक्त यही विश्वास लेकर जीता है — माँ दिखें न दिखें, हैं यहीं।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

बर्धमान अंचल का प्राचीन पीठ; वैशाखी युगाद्या-उत्सव और जलवास-परंपरा।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

🔗 संबंधित शक्तिपीठ