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52 शक्तिपीठ

फुल्लरा (अट्टहास)

52 शक्तिपीठ में क्रम 49 — अट्टहास (लाभपुर अंचल), पश्चिम बंगाल

फुल्लरा (अट्टहास)

फुल्लरा

📍 अट्टहास (लाभपुर अंचल), पश्चिम बंगाल

✨ एक झलक

मान्यता है कि अट्टहास में सती का अधरोष्ठ (निचला होंठ) गिरा; देवी फुल्लरा रूप में और भैरव विश्वेश रूप में पूजित। लाभपुर (बीरभूम अंचल) का यह पीठ चंडीमंगल काव्य की फुल्लरा-परंपरा और लोक-साहित्य से जुड़ा विरल साहित्य-सिंचित तीर्थ है।

🛕 पीठ-परिचय

क्षेत्रीय परंपरा
देवी (शक्ति) रूपफुल्लरा
भैरवविश्वेश
गिरा अंग/आभूषणअधरोष्ठ (निचला होंठ)
आधुनिक स्थानअट्टहास (लाभपुर अंचल), पश्चिम बंगाल
देशभारत

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

🪔 दक्ष-यज्ञ से इस पीठ तक

सती-देह की अंग-वर्षा में एक पीठ का नाम ही विस्मित करता है — अट्टहास, अर्थात प्रचंड हास। परंपरा कहती है कि यहाँ सती का अधरोष्ठ — निचला होंठ — गिरा; वही ओष्ठ जिस पर मुस्कान खिलती है। शोक की कथा में हास का नाम — परंपरा की यह गहरी व्यंजना है: जहाँ माता का हास-अंग उतरा, वहाँ की भूमि को नाम मिला अट्टहास — मानो देवी कह रही हों कि विदा के आँसुओं के बाद भी सृष्टि में हँसी लौटेगी। कुछ परंपराएँ इस नाम को शिव या देवी के लोकोत्तर अट्टहास से भी जोड़ती हैं — दोनों भाष्य लोक में चलते हैं। देवी यहाँ फुल्लरा कहलाती हैं — "फुल्ल" अर्थात खिली हुई — और भैरव विश्वेश रूप में।

फुल्लरा नाम बंगाल के हृदय में साहित्य से बसा है। मध्यकालीन बंगाल की काव्य-संपदा — चंडीमंगल — की सबसे प्रिय कथा व्याध कालकेतु और उसकी पत्नी फुल्लरा की है: वन के उस निर्धन दंपती की, जिसे देवी चंडी ने अपनी कृपा का पात्र चुना। कवि मुकुंदराम चक्रवर्ती की लेखनी में फुल्लरा का दारिद्र्य-वर्णन बांग्ला साहित्य के मार्मिकतम पृष्ठों में है — बारह मासों के अभाव की वह गाथा, जिसे सुनकर पीढ़ियाँ रोई हैं। अट्टहास की देवी का फुल्लरा नाम इस काव्य-परंपरा से संगति पाता है — यह पीठ मानो साहित्य और श्रद्धा का संधि-स्थल है: जहाँ देवी उसी नाम से पूजित हैं जो नाम बंगाल की लोक-कविता ने अमर किया।

🛕 देवी, भैरव और स्थान

पीठ की स्थली बीरभूम अंचल के लाभपुर के निकट अट्टहास ग्राम-क्षेत्र में है — वट-अश्वत्थ के प्राचीन वृक्षों से घिरा शांत मंदिर-परिसर, जिसके एकांत में पीठ-भाव सहज उतरता है। गर्भगृह में देवी की उपासना बंगाल की शिला-परंपरा में होती है; परिसर में विशाल प्राचीन वृक्षों की छाया ही मानो देवी का चँदोवा है। यह भूमि साहित्य से एक और नाता रखती है — लाभपुर कथाशिल्पी ताराशंकर बंद्योपाध्याय की जन्मभूमि है, जिनकी कथाओं में बीरभूम की माटी, उसके साधु-फकीर और देवी-स्थान बार-बार जीवित हुए। एक ही अंचल में मंगलकाव्य की फुल्लरा और आधुनिक कथा-साहित्य का शिखर — अट्टहास सचमुच सरस्वती-सिंचित शक्ति-भूमि है।

बीरभूम की पीठ-श्रृंखला — कांकालीतला, बक्रेश्वर, नलहाटी, नंदीपुर — की इस कड़ी में अट्टहास अपने एकांत के लिए विशिष्ट है। यहाँ तीर्थ-पर्यटन की भीड़ कम, साधना और लोक-पूजा की निरंतरता अधिक है। साधु-परंपरा की धूनियाँ, अमावस्या की विशेष पूजा और वट-तले बँधी मनौती की डोरियाँ — यह पीठ बंगाल के उस देवी-लोक की झलक देता है जो प्रचार से दूर, परंपरा में जीता है। तारापीठ-अंचल की साधना-वायु यहाँ तक बहती है।

पर्व-परंपरा में वसंत की तिथियों और नवरात्र पर यहाँ मेले लगते हैं; काली पूजा और दुर्गापूजा के साथ माघ-फाल्गुन की स्थानीय तिथियाँ भी विशेष हैं। मेले के दिनों ग्राम-बंगाल का पूरा रस उमड़ता है — कीर्तन, बाउल-गान, पट-चित्र और मिट्टी के खिलौनों के हाट। चंडीमंगल-गान की परंपरा वाले गायक जब फुल्लरा-कालकेतु की कथा गाते हैं, तो लगता है पीठ की देवी अपने ही नाम की गाथा सुन रही हैं — साहित्य पूजा बन जाता है, पूजा साहित्य।

🎉 परंपरा, पर्व और भाव

ऋतुओं के साथ इस पीठ का रूप बदलता है — वर्षा में वट-अश्वत्थ की छायाएँ और गहरी हो जाती हैं और मंदिर-प्रांगण हरे मौन में डूब जाता है; शीत की भोर में कुहासे से झाँकता शिखर किसी पुराने पट-चित्र जैसा लगता है। साहित्य-प्रेमी यात्री भी यहाँ खिंचे आते हैं — ताराशंकर की कथा-भूमि देखने लाभपुर आए पाठक प्रायः अट्टहास तक आते हैं, और लौटते समय उनके पास दो तीर्थों का प्रसाद होता है: एक देवी का, एक साहित्य का।

फुल्लरा पीठ की कथा का सार उसके नाम-द्वय में है: अट्टहास और फुल्लरा — प्रचंड हास और खिली हुई। जीवन की दरिद्रता (कालकेतु-फुल्लरा की कथा) के बीच भी खिले रहना — यही इस पीठ की सीख है। निचले होंठ की देवी अपने भक्तों से कहती हैं: रोना पड़े तो रो लो, पर मुस्कान मत खोना — क्योंकि माता का अधर जिस भूमि पर उतरा, उसका नाम ही हास है। दुख की कथा से निकला यह हास-तीर्थ भारतीय परंपरा की उस गहरी समझ का स्मारक है कि शोक अंतिम सत्य नहीं — आनंद है।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

चंडीमंगल काव्य-परंपरा से जुड़ा पीठ; लाभपुर अंचल की लोक-श्रद्धा।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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