जन्म और आदर्श शासन
नाभि-मेरुदेवी के घर जन्मे ऋषभ के लक्षण जन्म से ही असाधारण थे — तेज, धैर्य, सौम्यता। युवा होने पर पिता ने उन्हें राज्य सौंपा और स्वयं वानप्रस्थ लिया। ऋषभदेव का शासन परंपरा में आदर्श का पर्याय है — उन्होंने प्रजा को कृषि, व्यवस्था और धर्म-मर्यादा का शिक्षण दिया; गुरुकुल-परंपरा का सम्मान किया; और स्वयं वह जीवन जिया जो प्रजा के लिए पाठ बन जाए। भागवत की कथा-धारा में इंद्र से जुड़ा एक प्रसंग भी आता है — वर्षा रोके जाने पर ऋषभदेव ने अपने योग-बल से राज्य (अजनाभ-वर्ष) को सींचा; परंपरा इसमें यह संकेत पढ़ती है कि सच्चा शासक प्रजा के पालन के लिए किसी बाहरी कृपा पर निर्भर नहीं रहता।
उनका विवाह इंद्र-कन्या जयंती से हुआ (भागवत-परंपरा), और उनके सौ पुत्र हुए। ज्येष्ठ थे भरत — वही महायोगी भरत, जिनकी अपनी कथा (मृग-मोह और जड़भरत-जन्म) भागवत की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में है। परंपरागत व्युत्पत्ति के अनुसार इसी भरत के नाम से इस भूखंड को "भारतवर्ष" कहा गया — यह भागवत-वर्णित परंपरा है; नामकरण की व्युत्पत्तियों पर विद्वानों में मत-भेद रहा है (दुष्यंत-पुत्र भरत से जोड़ने वाली परंपरा भी प्रचलित है), अतः हम इसे "परंपरागत व्युत्पत्ति" के रूप में ही रखते हैं।
अंतिम उपदेश — मानव-जन्म का उद्देश्य
फिर आया वह मोड़ जो इस कथा को अद्वितीय बनाता है। भरी सभा में ऋषभदेव ने पुत्रों को अंतिम उपदेश दिया — भागवत का यह खंड आज भी वैराग्य-साहित्य का शिखर माना जाता है। उपदेश का सार: यह मनुष्य-देह उन भोगों के लिए नहीं है जो विष्ठा-भोजी प्राणियों को भी सुलभ हैं; यह देह तप के लिए है — उस तप के लिए जिससे अंतःकरण शुद्ध होता है, और शुद्ध अंतःकरण से वह आनंद मिलता है जो अनंत है। उन्होंने कहा — महत् (संतों) की सेवा मुक्ति का द्वार है और विषयी-संग अंधकार का; और वह कठोर कसौटी दी जो हर पीढ़ी के माता-पिता के लिए दर्पण है: वह पिता, पिता नहीं; वह गुरु, गुरु नहीं — जो अपने आश्रित को जन्म-मृत्यु के चक्र से पार लगाने की दिशा न दे।
उन्होंने भरत को राज्य सौंपा — और यह चुनाव भी उपदेश था: भरत सौ में सबसे योग्य थे, ज्येष्ठ भी; योग्यता और मर्यादा का संगम।
अवधूत-चर्या — देह-भाव से परे
उपदेश देकर ऋषभदेव ने वह किया जो उपदेश से भी बड़ा था — उन्होंने उसे जीकर दिखाया। राज्य, वस्त्र, पहचान — सब उतारकर वे अवधूत हो गए। भागवत वर्णन करता है कि वे जड़, अंधे, बहरे जैसी चर्या से विचरे — लोग अपमान करते, कंकड़ फेंकते, पर वे साक्षी-भाव में अडिग रहे; शरीर की सुध छोड़ी, पर भीतर का जागरण अखंड रहा। परंपरा इसे "अजगर-वृत्ति" कहती है — जो मिले उसी में तृप्त, माँग शून्य। यह वर्णन पढ़ते समय स्मरण रहे — यह अनुकरण की विधि नहीं, वैराग्य की पराकाष्ठा का चित्र है; भागवत स्वयं इसे परमहंसों की गति कहता है, सामान्य गृहस्थ का मार्ग नहीं।
अंत में परंपरा के अनुसार कुटकाचल (दक्षिण की पर्वत-श्रेणी) के वनों में दावानल के बीच उन्होंने देह का विसर्जन किया — जैसे वस्त्र अग्नि को सौंप दिया हो। जिसने देह को कभी "मैं" नहीं माना, उसके लिए देह-त्याग भी एक सहज विश्राम था।
जैन परंपरा — आदरणीय समांतर दृष्टि
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य पूर्ण सम्मान से कहना आवश्यक है। जैन परंपरा ऋषभनाथ (आदिनाथ) को अपने प्रथम तीर्थंकर के रूप में पूजती है — नाभि-मरुदेवी के पुत्र, भरत चक्रवर्ती के पिता, त्याग-मार्ग के आदि-प्रवर्तक; कैलास (अष्टापद) से निर्वाण की मान्यता। नाम, माता-पिता और त्याग-चरित्र का यह साम्य स्पष्ट है — किंतु हिंदू (भागवत) और जैन परंपराओं की दार्शनिक दृष्टि, कथा-विवरण और उपासना-पद्धति अपनी-अपनी हैं। कुछ विद्वान दोनों को एक ही महापुरुष की दो स्मृतियाँ मानते हैं; कुछ दोनों परंपराओं को स्वतंत्र मानते हैं। हम न किसी परंपरा का दावा खारिज करते हैं, न "निर्विवाद रूप से एक ही हैं" कहते हैं — दोनों दृष्टियाँ अपने-अपने घर में पूज्य हैं, और दोनों का साझा हृदय एक है: त्याग की पराकाष्ठा का आदर।
भरत-कथा — ऋषभ-वंश की अगली कड़ी
ऋषभ-कथा की पूर्णता उनके पुत्र भरत की कथा से होती है, जो भागवत में आगे विस्तार से आती है — आदर्श राजा भरत ने भी पिता की तरह समय पर राज्य त्यागा और वन में साधना की; किंतु एक घायल मृग-शावक के मोह ने उनकी समाधि बाँध ली, और परंपरा के अनुसार अंतिम स्मृति के विधान से उन्हें मृग-जन्म लेना पड़ा। तीसरे जन्म में वे जड़भरत हुए — ज्ञान पूर्ण, पर संसार से पूर्ण मौन; राजा रहूगण को दिया उनका उपदेश भागवत के दार्शनिक शिखरों में है। पिता-पुत्र की ये कथाएँ मिलकर वैराग्य-शिक्षा का पूरा पाठ्यक्रम बनती हैं — ऋषभ बताते हैं कि त्याग कैसे किया जाता है; भरत चेताते हैं कि त्याग के बाद भी मोह की एक डोर (चाहे वह करुणा-वेश में ही क्यों न आए) साधक को लौटा सकती है; और जड़भरत दिखाते हैं कि गिरकर भी यात्रा नष्ट नहीं होती — अगले जन्म में वहीं से आगे चलती है। ऋषभ-वंश की यह त्रि-पीढ़ी कथा भागवत का "वैराग्य-खंड" कहलाने योग्य है।