प्राकट्य — संकल्प से जन्मे चार बालक
परंपरा के अनुसार ब्रह्माजी ने सृष्टि-विस्तार के लिए सबसे पहले अपने मन से चार पुत्रों को प्रकट किया — सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार। ये "मानस-पुत्र" कहलाए, क्योंकि इनका जन्म गर्भ से नहीं, शुद्ध संकल्प से हुआ। जन्म लेते ही इनके मुख पर जो शांति थी, वह किसी नवजात की नहीं — किसी सिद्ध की थी।
ब्रह्माजी की अपेक्षा स्पष्ट थी — ये पुत्र विवाह करें, प्रजा उत्पन्न करें, सृष्टि का विस्तार सँभालें। किंतु चारों कुमारों ने विनम्रता से यह मार्ग अस्वीकार कर दिया। उन्होंने गृहस्थ नहीं, अखंड ब्रह्मचर्य चुना; बाहर का विस्तार नहीं, भीतर की गहराई चुनी। कथा के अनुसार उनके इस निश्चय से ब्रह्माजी के भीतर जो क्षोभ उठा, उसी से आगे रुद्र-प्राकट्य की पुराण-कथा जुड़ती है — अर्थात सृष्टि के आरंभिक क्षणों में ही यह तनाव प्रकट हो गया था: एक ओर रचना का आग्रह, दूसरी ओर वैराग्य का।
सदा बालक — एक गहरा प्रतीक
परंपरा में चारों कुमारों की सबसे विलक्षण पहचान यह है कि वे सदा पाँच वर्ष के बालक जैसे दिखते हैं। यह केवल चमत्कार-वर्णन नहीं, गहरा प्रतीक है — ज्ञान जब निर्मल हो, तो चित्त बालक जैसा सरल, निष्कपट और ताज़ा बना रहता है। संसार के अनुभव मनुष्य को प्रायः जटिल और भारी बना देते हैं; कुमार बताते हैं कि सच्चा ज्ञानी अनुभवों से बोझिल नहीं, और अधिक निर्मल होता जाता है।
चारों सदा साथ विचरते हैं — लोक-लोकांतर में, जहाँ सत्संग हो, जहाँ जिज्ञासा हो। पुराणों में वे अनेक बार कथा-प्रसंगों के "प्रश्नकर्ता" या "उपदेशक" के रूप में प्रकट होते हैं — मानो परंपरा ने उन्हें जिज्ञासा और समाधान, दोनों का स्थायी प्रतीक बना दिया हो।
वैकुण्ठ-यात्रा और जय-विजय प्रसंग
श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध में वर्णित यह प्रसंग अवतार-कथाओं की पूरी शृंखला की कुंजी है। एक बार चारों कुमार भगवान विष्णु के दर्शन की इच्छा से वैकुण्ठ पहुँचे। वे छह द्वार पार कर चुके थे; सातवें द्वार पर दो द्वारपाल खड़े थे — जय और विजय। बाल-रूप देखकर द्वारपालों ने उन्हें साधारण बालक समझा और भीतर जाने से रोक दिया।
कथा के अनुसार जिन कुमारों को काम-क्रोध छू नहीं पाते थे, उन्हें इस अवरोध में वैकुण्ठ के स्वभाव के विरुद्ध आचरण दिखा — वैकुण्ठ में भेद-दृष्टि कैसी? उनके क्षोभ से द्वारपालों को यह शाप मिला कि उन्हें वैकुण्ठ छोड़कर उन योनियों में जन्म लेना होगा जहाँ काम-क्रोध का प्रभाव चलता है। जय-विजय के अनुनय पर मार्ग भी खुला — परंपरा कहती है कि उन्हें विकल्प मिला: भगवान के भक्त रूप में अनेक जन्म, या विरोधी रूप में केवल तीन जन्म। शीघ्र लौटने की आतुरता में उन्होंने तीन विरोधी-जन्म स्वीकार किए।
इसी शाप-सूत्र से पुराण-परंपरा की तीन महाकथाएँ जुड़ती हैं — पहले जन्म में हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु (जिनसे वराह और नरसिंह अवतार जुड़े), दूसरे में रावण-कुंभकर्ण (राम-कथा), तीसरे में शिशुपाल-दन्तवक्र (कृष्ण-कथा)। अर्थात सनकादि-प्रसंग को समझे बिना अवतार-कथाओं की शृंखला अधूरी रह जाती है — पहला अवतरण ही आगे के कई अवतरणों का कारण-सूत्र बुन देता है।
विष्णु का प्राकट्य और कुमारों का भाव
कथा आगे कहती है कि उसी क्षण भगवान विष्णु स्वयं द्वार पर प्रकट हुए। अपने आराध्य को सम्मुख पाकर कुमारों का क्षोभ तत्क्षण गल गया — उन्होंने भगवान के चरण-सान्निध्य की सुगंध में वह आनंद पाया जिसकी खोज में वे वैकुण्ठ आए थे। परंपरा के अनुसार भगवान ने द्वारपालों के प्रति भी न्याय-भाव रखा और कुमारों के प्रति भी — उन्होंने संकेत किया कि सेवकों की त्रुटि स्वामी की ही त्रुटि मानी जाए, और शाप को लीला-विधान का अंग बना दिया। कुमारों को इस प्रसंग में यह भी दिखा कि क्रोध कितना सूक्ष्म है — जो द्वार तक तपस्या से पहुँचे, वहाँ भी एक क्षण का क्षोभ इतिहास रच सकता है। इसीलिए परंपरा इस प्रसंग को दोष-कथा नहीं, शिक्षा-कथा मानती है।
ज्ञान-परंपरा — नारद से पृथु तक
सनकादि केवल एक प्रसंग के पात्र नहीं — वे भारतीय ज्ञान-परंपरा की जीवित धारा हैं। छान्दोग्य उपनिषद् का प्रसिद्ध संवाद देखिए — देवर्षि नारद सनत्कुमार के पास आते हैं और अपनी सारी विद्याएँ गिनाते हैं: वेद, इतिहास, व्याकरण, गणित, और भी बहुत कुछ। फिर स्वीकार करते हैं कि इतना जानकर भी शांति नहीं मिली। सनत्कुमार उन्हें क्रमशः ऊपर उठाते हुए "भूमा" तक ले जाते हैं — वह विराट, अखंड सत्य, जिसमें कुछ और देखना-सुनना शेष नहीं रहता; और कहते हैं कि सुख भूमा में है, अल्प में सुख नहीं। जानकारी और ज्ञान का यह भेद इस संवाद की अमर देन है।
श्रीमद्भागवत में ही आगे सनकादि महाराज पृथु की सभा में पधारकर उन्हें आत्म-ज्ञान का उपदेश देते हैं। वैष्णव परंपराओं में "कुमार-संप्रदाय" (निम्बार्क-परंपरा की गुरु-पंक्ति) की धारा भी सनकादि से जोड़ी जाती है। इस प्रकार सृष्टि के पहले अवतरण का कार्य किसी असुर का वध नहीं था — अज्ञान का वध था; और वह कार्य आज भी चल रहा है, हर सच्चे सत्संग में।