"आप कौन हैं?" — और वह उत्तर
दिव्य हंस को देख कुमारों ने स्वाभाविक प्रश्न किया — आप कौन हैं? (क: भवान्)। और हंस-रूप भगवान ने जो उत्तर दिया, वह वेदांत की गहनतम पंक्तियों में गिना जाता है — उन्होंने कहा: यदि आत्मा एक और अद्वितीय है, तो तुम्हारा यह प्रश्न बनता ही कहाँ है? "कौन" पूछने वाला कौन, और उत्तर देने वाला कौन — जब तत्त्वतः दो हैं ही नहीं? और यदि प्रश्न देह की ओर संकेत करके पूछा गया है, तो देह तो पाँच भूतों का समान पिंड है — सब देहों में वही मिट्टी-जल-तेज; वहाँ भी "कौन" का भेद टिकता नहीं।
यह उत्तर उलट-प्रश्न की शैली में दिया गया परम उपदेश है — प्रश्न का खंडन नहीं, प्रश्नकर्ता की धारणा का शोधन: भेद-दृष्टि जहाँ से उठती है, अज्ञान वहीं से शुरू होता है। जो "मैं-तुम" की ग्रंथि खोले बिना योग पूछ रहा है, वह ताले के भीतर बैठकर चाबी माँग रहा है।
हंस-गीता — ग्रंथि खोलने की विधि
फिर हंस-रूप भगवान ने कुमारों की मूल जिज्ञासा का समाधान किया — जिसे परंपरा हंस-गीता कहती है। सार यह है: मन और विषयों की ग्रंथि वास्तविक नहीं, कल्पित है — जीव ने ही तादात्म्य से उसे गूँथा है; जैसे स्वप्न में देखा बंधन जागने पर "खोलना" नहीं पड़ता, वैसे ही आत्म-बोध होते ही मन का बंधन अपने-आप निरर्थक हो जाता है। गुण (सत्त्व-रज-तम) प्रकृति के धर्म हैं — आत्मा के नहीं; चित्त की तरंगें गुणों का खेल हैं, और द्रष्टा उनसे अछूता साक्षी। विषय-चिंतन से मन विषयों में धँसता है; भगवत्-चिंतन से वही मन निर्मल होकर स्रोत की ओर मुड़ जाता है — अतः विधि है: संग बदलो, चिंतन बदलो, और साक्षी-भाव में टिको। जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति — तीनों अवस्थाएँ बदलती हैं; जो तीनों को देखता है, वह चौथा (तुरीय-भाव) ही तुम्हारा स्वरूप है।
परंपरा कहती है कि कुमारों की ग्रंथि खुल गई — जिन बाल-ऋषियों को हमने इस माला के पहले मनके (सनकादि) में ज्ञान-दाता रूप में देखा था, वे यहाँ विनम्र जिज्ञासु हैं: ज्ञानी की पहचान ही यह है कि वह आजीवन शिष्य रहता है।
हंस-प्रतीक — काव्य, योग और संन्यास
इस अवतरण ने "हंस" शब्द को भारतीय अध्यात्म का स्थायी प्रतीक बना दिया। काव्य-परंपरा का नीर-क्षीर विवेक — हंस दूध-जल मिश्रण से दूध छाँट लेता है — यहाँ अपना पूरा अर्थ पाता है: यह प्रतीक/काव्य-परंपरा है, जैविक तथ्य नहीं (वास्तविक हंस पक्षी ऐसा रासायनिक पृथक्करण नहीं करता — प्रतीक का बल उसकी शिक्षा में है, जीव-विज्ञान में नहीं); शिक्षा यह कि विवेकी चेतना अनुभव-मिश्रण में से सार ग्रहण करती है। योग-परंपरा में "हंसः-सोऽहम्" श्वास-साधना है — निरंतर चलती साँस में आत्म-स्मृति का मंत्र। और संन्यास-परंपरा ने अपनी सर्वोच्च अवस्था को परमहंस नाम दिया — भागवत में भगवान बार-बार "परमहंसों के आराध्य" कहे गए हैं; रामकृष्ण परमहंस जैसे नामों तक यह परंपरा जीवित है। ब्रह्मा-सरस्वती के वाहन रूप में हंस ज्ञान-परंपरा का चिह्न पहले से है — हंस-अवतरण मानो उस प्रतीक का स्रोत-वक्तव्य है।
गणना-भेद — ईमानदार सूचना
अब वह बात, जो इस पोर्टल की नीति के अनुसार स्पष्ट कहनी चाहिए — हंस-अवतार की गणना में परंपरा-भेद है। भागवत के प्रथम स्कंध की प्रसिद्ध सूची में हंस का नाम उस रूप में नहीं गिना गया; यह अवतरण एकादश स्कंध की हंस-गीता परंपरा और अन्य प्रसंगों के आधार पर चौबीस की प्रचलित सूची में स्थान पाता है — कुछ परंपराएँ चौबीस की गिनती अन्य नामों (पृश्निगर्भ आदि) से पूरी करती हैं। और सच पूछिए तो स्वयं भागवत ने इसी संदर्भ में कह रखा है — "अवतारा ह्यसंख्येया": अवतार असंख्य हैं; गिनती परंपरा की सुविधा है, सीमा नहीं।