गोकुल-वृंदावन — लीलाओं का विश्वविद्यालय
यशोदा-नंद के आँगन में पला वह बालक ब्रज का प्राण बन गया। कंस ने संकट भेजे — विष-स्तन लेकर आई पूतना का उद्धार (मृत्यु भी उस बालक के स्पर्श से माता-गति पा गई — यह भाव भक्ति-परंपरा को अत्यंत प्रिय है), शकटासुर (छकड़ा-रूप संकट) और बवंडर-रूप तृणावर्त का अंत — शिशु-लीलाओं में ही आतंक के प्रतीक ढहते गए। माखन-चोरी की लीलाएँ ब्रज के घर-घर की स्मृति बनीं — भक्ति-दर्शन इनमें गहरा अर्थ पढ़ता है: भगवान को "चुराना" पड़े, ऐसा प्रेम; और माखन जैसा नवनीत-हृदय ही उनका भोग है। दामोदर-प्रसंग (ऊखल-बंधन) की व्याख्या परंपरा का रत्न है — जो ब्रह्मांड में नहीं समाता, वह माता के प्रेम की दो अंगुल रस्सी से बँध गया: भगवान बल से नहीं, प्रेम से बँधते हैं। यशोदा को मुख में विश्वरूप-दर्शन भी इसी काल की कथा है — गोद में ब्रह्मांड।
वृंदावन-काल में कालिय-दमन आया — यमुना को विषाक्त करते नाग के फणों पर किशोर कृष्ण का नृत्य: विष पर नृत्य करती निर्भयता; कालिय को मारा नहीं, मर्यादा देकर रमणक द्वीप भेजा — शत्रु का भी पुनर्वास। फिर वह प्रसंग जो कृष्ण-दर्शन की घोषणा बन गया — गोवर्धन-लीला: कृष्ण ने ब्रजवासियों से कहा कि पूजा उस पर्वत, गौ और प्रकृति की करो जो प्रत्यक्ष पालन करती है; इंद्र के कोप की मूसलधार में सात दिन गोवर्धन को छत्र-सा उठाए रखा। सत्ता के अहंकार के सामने प्रकृति-पूजा और अभय — गोवर्धन-कथा का यह पाठ आज पर्यावरण-चेतना की भाषा में और चमकता है (यह व्याख्या-दृष्टि है, विज्ञान-दावा नहीं)। इंद्र ने क्षमा माँगी — "गोविंद" अभिषेक हुआ।
रासलीला — शरद-पूर्णिमा की वह महारात्रि — भक्ति-परंपरा में प्रेम-तत्त्व की पराकाष्ठा है, और इसे सांसारिक प्रेम-कथा की तरह पढ़ना घोर भूल है: भागवत स्वयं इसे योगमाया के आश्रय की दिव्य लीला कहता है; आचार्य-परंपरा (शुकदेव से चैतन्य-परंपरा तक) इसे जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का रूपक पढ़ती आई है — हर गोपी के साथ एक कृष्ण का भाव यह कि परमात्मा प्रत्येक जीव के लिए पूर्ण उपलब्ध है; और मान (अहं) आते ही कृष्ण का अंतर्धान यह कि प्रेम में "मैं" का प्रवेश ही वियोग है। गोपी-भाव भक्ति का शिखर-मानक बना — निष्काम, अनन्य, सर्वस्व-समर्पित प्रेम।
मथुरा — किशोर के हाथों सत्ता-परिवर्तन
कंस ने धनुष-यज्ञ के बहाने अक्रूर को भेजकर दोनों भाइयों को मथुरा बुलाया — गोपियों का विरह-प्रसंग भक्ति-काव्य की सबसे भीगी धारा है। मथुरा में कुब्जा पर कृपा, धनुष-भंग; फिर द्वार पर मत्त गजराज कुवलयापीड़ और अखाड़े में चाणूर-मुष्टिक — किशोर भाइयों ने सब पार किया। अंततः मंच से कूदकर कृष्ण ने कंस को केश पकड़कर नीचे उतारा और उसका अंत किया — आतंक की सत्ता गिरी। पर ध्यान दीजिए — कृष्ण सिंहासन पर नहीं बैठे: उग्रसेन को पुनः राजा बनाया। सत्ता-परिवर्तन का प्रयोजन न्याय था, स्वयं की गद्दी नहीं — कृष्ण-नीति का पहला सूत्र यहीं लिखा गया। फिर संदीपनि-आश्रम में विद्या-ग्रहण और गुरु-दक्षिणा में गुरु के मृत पुत्र की वापसी की कथा — अवतार भी गुरु-ऋण से मुक्त नहीं।
कंस-वध से क्रुद्ध जरासंध ने मथुरा पर बार-बार आक्रमण किए (परंपरा में सत्रह बार); हर बार पराजित होकर भी वह नगर को क्षीण करता रहा। तब कृष्ण ने वह निर्णय लिया जिसे लोक ने "पलायन" कहा और नीति ने दूरदर्शिता — प्रजा की रक्षा हेतु मथुरा छोड़कर समुद्र-मध्य द्वारका बसाई; इसीलिए एक नाम "रणछोड़" भी मिला, जिसे भक्त गौरव से लेते हैं: जो अपने यश से अधिक प्रजा के प्राण को तौले, वही सच्चा नेता।
द्वारका — नीति, गृहस्थ और सखा-धर्म
द्वारकाधीश-काल कृष्ण के नीतिज्ञ-रूप का विस्तार है — रुक्मिणी-हरण (स्वयं रुक्मिणी की पत्रिका पर उनकी इच्छा से पाणिग्रहण), सत्यभामा-जाम्बवती आदि विवाह-प्रसंग; स्यमन्तक मणि की कथा — जिसमें मिथ्या कलंक लगने पर कृष्ण ने स्वयं खोज कर सत्य प्रकट किया: कलंक का उत्तर स्पष्टीकरण से, क्रोध से नहीं। नरकासुर-वध कर सोलह सहस्र बंदिनी स्त्रियों को मुक्त किया और समाज में पुनः प्रतिष्ठा दी — परंपरा इस प्रसंग को नारी-गरिमा की पुनर्स्थापना के रूप में पढ़ती है; दीपावली-परंपरा का नरक-चतुर्दशी पर्व इसी विजय की स्मृति है।
और सुदामा — दरिद्र सखा मुट्ठी भर तंदुल लेकर आया, तो द्वारकाधीश दौड़कर मिले, चरण धोए, सिंहासन पर बिठाया; बिना माँगे सब कुछ दिया, जताया कुछ नहीं। मित्रता का यह मानक विश्व-साहित्य में अद्वितीय है — संपत्ति मित्रता नहीं तौलती। राजसूय-यज्ञ (युधिष्ठिर) में कृष्ण ने अग्र-पूजा पाई और आतिथ्य में जूठी पत्तलें उठाने का काम चुना — श्रेष्ठता और सेवा का यह संगम ही कृष्णत्व है; वहीं सौ अपशब्द पूरे होने पर शिशुपाल (जय-विजय शृंखला का अंतिम जन्म) का चक्र से अंत हुआ — क्षमा की भी मर्यादा होती है। जरासंध का अंत भीम के हाथों (कृष्ण-नीति से) हुआ और बंदी राजा मुक्त हुए।
कुरुक्षेत्र — सारथी और गीता
महाभारत-संधि पर कृष्ण की भूमिका उनके अवतार-कार्य का शिखर है — और विलक्षण यह कि यह शिखर बिना शस्त्र उठाए चढ़ा गया। पांडवों के शांतिदूत बनकर वे कौरव-सभा गए — पाँच ग्राम का अंतिम प्रस्ताव; दुर्योधन के बंधन-प्रयास पर विश्वरूप दिखाकर लौटे: युद्ध अब अनिवार्य था, और उत्तरदायित्व अधर्म-पक्ष पर। द्रौपदी-चीरहरण के क्षण से ही परंपरा कृष्ण को धर्म-पक्ष की लाज का रक्षक मानती आई है — सभा में जब सब मौन थे, तब अकेली पुकार "गोविंद" काम आई थी। युद्ध में उन्होंने प्रतिज्ञा ली — शस्त्र नहीं उठाऊँगा; अर्जुन का सारथी बनूँगा: विश्व का स्वामी भक्त के घोड़ों की रास थामे — परंपरा की दृष्टि में सेवा और नीति का युगपत् शिखर।
और फिर रणभूमि के मध्य वह क्षण, जब स्वजनों को देख अर्जुन का धनुष शिथिल हुआ — वहीं जन्मी श्रीमद्भगवद्गीता: सात सौ श्लोकों की परंपरा वाला वह संवाद जो मानवता की अमूल्य धरोहर है। गीता का सार-सूत्र: आत्मा अजर-अमर है; कर्म करो, फल की आसक्ति छोड़ो (निष्काम कर्मयोग); समत्व ही योग है; ज्ञान-भक्ति-कर्म तीनों धाराएँ एक ही सागर में मिलती हैं; और अभय-वचन — धर्म की ग्लानि पर मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ, तथा शरणागति का चरम आश्वासन। विश्वरूप-दर्शन ने अर्जुन को दिखा दिया कि सारथी कौन है। युद्ध के नैतिक द्वंद्वों (भीष्म-द्रोण-कर्ण प्रसंगों की कठिन नीतियों) में कृष्ण की भूमिका पर परंपरा सदियों से मंथन करती आई है — कृष्ण का अपना उत्तर सुसंगत है: जहाँ एक पक्ष ने धर्म की हर मर्यादा पहले ही तोड़ दी हो, वहाँ धर्म-रक्षा का तराजू बड़े संतुलन से तौलना पड़ता है; अधर्म पर धर्म की विजय सर्वोपरि है। यही धर्मयुद्ध का नैतिक संदर्भ है — गीता युद्ध का नहीं, कर्तव्य-बोध का शास्त्र है।
संध्या — शाप, प्रस्थान और "स्वयं भगवान"
विजय के बाद गांधारी के शोक-शाप को कृष्ण ने शिरोधार्य किया — यदुवंश का मद ही उसका काल बनेगा। छत्तीस वर्ष बाद प्रभास-क्षेत्र में मौसल-प्रसंग से यदुवंश का अंत हुआ — कृष्ण ने रोका नहीं; मद चाहे अपनों का हो, परिणाम विधान से नहीं बचता। उद्धव को अंतिम ज्ञान (उद्धव-गीता की परंपरा) देकर, बलराम के शेष-गमन के बाद, पीपल तले योगस्थ कृष्ण के चरण-तल में जरा व्याध का बाण लगा — व्याध व्याकुल हुआ, कृष्ण ने सांत्वना देकर उसे निमित्त-मात्र कहा और स्वधाम-प्रस्थान किया। परंपरा के अनुसार इसी संधि से कलियुग की गणना जुड़ी है।
श्रीमद्भागवत इस पूरे चरित्र पर अपना निर्णायक वाक्य कहता है — "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्": अन्य अवतार भगवान के अंश-कला हैं; कृष्ण स्वयं भगवान हैं। इसीलिए परंपरा उन्हें "पूर्णावतार" कहती है — जन्म कारागार में और जीवन मुक्ति का शास्त्र; हर भूमिका पूरी, किसी में आसक्ति नहीं: यही "लीला" है।
भाव-ग्राही जनार्दन — छोटे अर्पणों की बड़ी कथाएँ
कृष्ण-चरित्र की एक पूरी धारा उन प्रसंगों की है जहाँ मूल्य वस्तु का नहीं, भाव का तौला गया। सुदामा के मुट्ठी भर तंदुल हमने देखे; वैसे ही विदुर के घर की सादी साग-भाजी — महाभारत-परंपरा कहती है कि हस्तिनापुर में दुर्योधन के राजसी आतिथ्य को छोड़ भगवान विदुर के प्रेम-भोजन में तृप्त हुए: मेवा छोड़ साग स्वीकारने वाली यह रुचि "भाव-ग्राही जनार्दन" की लोक-उक्ति बन गई। द्रौपदी के अक्षय-पात्र प्रसंग में वनवास-काल का एक बचा हुआ अन्न-कण स्वीकार कर उन्होंने ऋषि-मंडली की क्षुधा शांत कराई — भक्ति-परंपरा का सूत्र यही है: भगवान मात्रा नहीं, मन देखते हैं। शबरी-परंपरा राम-कथा में थी; कृष्ण-कथा में वही आसन विदुराणी और गोप-बालकों की जूठी मिठाइयों को मिला।
उद्धव-प्रसंग — ज्ञान पर प्रेम की विजय
मथुरा-काल का एक प्रसंग भक्ति-दर्शन की धुरी बना — ज्ञानी सखा उद्धव को कृष्ण ने व्रज भेजा कि गोपियों को ज्ञान-संदेश देकर धीरज बँधाएँ। उद्धव निर्गुण-ज्ञान का उपदेश लेकर गए — और गोपियों के प्रेम की एक झलक ने उपदेशक को शिष्य बना दिया: गोपियों ने कहा, हमारा मन तो एक ही था, वह कृष्ण ले गए — अब ज्ञान किसमें धरें? परंपरा कहती है कि उद्धव व्रज-रज को प्रणाम कर लौटे — यह स्वीकारते हुए कि प्रेम की वह ऊँचाई उपदेशों से परे है। द्वारका-काल के अंत में यही उद्धव अंतिम उपदेश (उद्धव-गीता की परंपरा — जिसमें अवधूत के चौबीस गुरुओं वाला दत्तात्रेय-प्रसंग भी कृष्ण-मुख से आता है) के पात्र बने — आरंभ में प्रेम की शिक्षा पाने वाला, अंत में ज्ञान की धरोहर पाता है: कृष्ण के विद्यालय में दोनों कक्षाएँ अनिवार्य हैं।